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राहत आप तो सच में जमींदार हो गए
Team The YuvaTime
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11 August 2020

आप तो दुनिया को बेचैन कर गए राहत!

किसी भी शायर का नाम कभी ज़ेहन में आता है तो दो तरह की छवि उभरती हैं। एक या तो बेहद शांत, बहुत पढ़े-लिखे, व्यक्तित्व के धनी शायर या फिर बड़े-बड़े बाल व दाढ़ी रखे बगल में एक झोला लटकाए कोई अनपढ़ या गंवार की तरह दिखने वाले शायर। ऐसे में यदि सूट पहने, सिर से बाल गायब, बिना दाढ़ी व मूछों के एक शांत-सा दिखने वाला इंसान कही सामने प्रगट हो और आते ही मोहब्बत, भाईचारे, हिंदुस्तान, सियासत तथा तारों-सितारों की दुनिया के नए रास्ते बताने लगे तो हृदय के किसी कोने में एक जोरदार धमाका होने से कोई रोक नहीं पाएं और अब तक जितने भी शायरों के जो तस्वीर आपने बना रखे थे वो सब एकाएक टूटते चले जाए तो आपको हैरानी के अलावा कुछ और नहीं हो सकता और ऐसा कारनामा करने वाले शायर थे राहत इंदौरी। जो इस महामारी के दौर में हृदय गति रुकने  के कारण वे मौत से हाथ मिला बैठें। 

अब आसमां के तरफ देखिए, उंगलियों के इशारों से तारों को बताइएं कि दुनिया का एक सितारा तुम्हारे अम्बर पर चमकने को जा चुका है। धरती को मोहब्बत से सींचने के बाद अब तुम्हारे अम्बर की बारी है। जिस तरह हमने प्यार से रखा था उसी तरह तुम भी रखना। उसकी आदत है वो मोहब्बत में भी सियासत देख लेता है। कम से कम तुम मोहब्बत में सियासत मत करना। वरना अम्बर की भी दुनिया उसके लिए बेरंग हो जाएगी। तारों के बीच अपने राहत को देख ये दुनिया रोज बेचैन हो उठेगी। उसकी आवाज हर पल याद दिलाती रहेगी। वो भी बेचैन होगा हमारे मोहब्बत को। पर खुदा के फैसले के बाद किसका हुकूमत चलता है? जो सच हो गया उसे न चाहते हुए भी स्वीकार तो करना ही पड़ता है।
राहत आप तो सच में जमींदार हो गए
"दो गज सही मगर ये मेरी मिल्कियत तो है।
ऐ मौत तूने मुझको जमींदार कर दिया।।"
राहत साहब आपने इसी शेर के जरिये लोगों को अपनी जमींदारी का परिचय दिया था। शायद उन्हें याद भी होगा कि अपनी मिल्कियत के हिस्से को किस तरह उस भीड़ में पेश किया था जिसपर वे लोग तालियों की गड़गड़ाहट से आपको जमींदारी की मुबारकबाद दी थी। उन दिनों आपकी जमींदारी से खुश लेकिन आज ये जमींदारी की खबर पलकों को भींगा रही है। ऐसी ही कई ख्वाहिश जिसे आपने सोचा था और पूरा करने के लिए दुनिया से शायरी के जरिए पेश किया था। आज उसे हर कोई अपने होठों पर लिए पूरा करने को तत्पर है।

मोहब्बत करने वाला चला गया
"जनाजे पर मिरे लिख देना यारो।
मोहब्बत करने वाला जा रहा है।।"

हमने नहीं, आपने खुद हिंदुस्तान लिखा था
"मैं जब मर जाऊ तो मिरा एक अलग पहचान लिख देना।
लहू से मेरी पेशानी पर हिंदुस्तान लिख देना।।"

इन अम्बर, तारों, सितारों सियासत और मोहब्बत की उन लकीरों के बीच राहत साहब ने अपने शायरी और शायराना अंदाज से करीब 60 साल तक लोगों को आईना दिखाया। फिर चुपके से दुनिया को अलविदा कह गए। किसी को मालूम न था कि हर किसी के कानों में गूंजने वाला आवाज आज ऐसे खामोशी से हमें छोड़ बेचैन कर देगा।
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