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क्या कन्हैया कुमार के सहारे जीतेंगे चुनाव?
Team The YuvaTime
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14 August 2020

बिहार में कम्यूनिस्ट पार्टी कैसे होगी मजबूत, क्या कन्हैया कुमार के सहारे जीतेंगे चुनाव?

बिहार विधानसभा चुनाव में अब कुछ ही दिन शेष बच गए हैं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआई) भी चुनाव मैदान में उतरने को लेकर कमर कस रही है। इस चुनाव में उन्हें उम्मीद है युवाओं के चहेते और विपक्ष के उभरते चेहरे कन्हैया कुमार से। सीपीआई इस बार कन्हैया के कंधे पर चढ़कर चुनावी वैतरणी पार करने को लेकर आतुर है। लंबे अरसे के बाद 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में सीपीआई के एक भी नेता जीत कर विधानसभा तक नहीं पहुंचे। वर्ष 1951 के पहले आम चुनाव में भी ऐसा हीं हुआ था जब विधानसभा में सीपीआई अपना खाता नहीं खोल सकी थी। 
एक समय था जब सड़क से लेकर सदन तक सीपीआई जनता के सवालों पर संघर्ष करती नजर आती थी लेकिन अब स्थिति उलट है। सीपीआई अब सिर्फ सड़क पर नजर आती है सदन में आवाज उठाने वाला  कोई नेता नहीं है। 
बिहार विधानसभा में पहली बार सीपीआई एंट्री 1957 के विधानसभा चुनाव में होती है। इस चुनाव में सीपीआई 60 विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ती है जिसमें 7 विधानसभा सीटों पर सफलता हाथ लगती है। इस चुनाव में कम्युनिस्ट पार्टी को 5.15 प्रतिशत मत हासिल होता है। 1962 के आम चुनाव में सीपीआई को 12 सीटें मिलती है इस चुनाव में सीपीआई ने 84 सीटों पर चुनाव लड़ा था। 6.23 प्रतिशत वोट सीपीआई को मिले थे। वर्ष 1967 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने 97 सीटों पर चुनाव लड़ा। 24 सीटों पर जीत मिली। इस चुनाव में सीपीआई को कुल 6.91 प्रतिशत मत प्राप्त हुए। वर्ष 1969 के चुनाव में सीपीआई ने 162 सीटों पर चुनाव लड़ा। लेकिन 25 सीटों से हीं पार्टी को संतोष करना पड़ा। इस चुनाव में इसका वोट प्रतिशत 10.10 हो गया। वर्ष 1972 के आम चुनाव में सीपीआई ने 55 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे और 35 सीटों पर जीत मिली। इस चुनाव में सीपीआई को  6.94 प्रतिशत वोट मिले। 
वर्ष 1977 के आम चुनाव जो देश में इमरजेंसी लगने और जेपी आंदोलन के बाद हुआ। बिहार से कांग्रेस की सरकार चली गई और जनता पार्टी सत्ता में आई। इस चुनाव में सीपीआई ने 73 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन 21 सीटों पर हीं जीत मिल सकी। इस चुनाव में सीपीआई को 7 प्रतिशत मत मिले। वर्ष 1980 के चुनाव में जनता पार्टी की सरकार चली गई। कांग्रेस की गठबंधन सरकार बनी। इस चुनाव के सीपीआई ने 135 सीटों पर चुनाव लड़ा, पर सफलता मात्र 23 सीटों पर हीं मिली। सीपीआई को इस चुनाव में 9.12 प्रतिशत वोट मिले। वर्ष 1985 के चुनाव में सीपीआई 167 सीटों पर चुनाव लड़ी पर मात्र 12 सीटों से हीं सन्तोष करना पड़ा। इस बार सीपीआई को 8.86 प्रतिशत वोट मिले।

वर्ष 1990 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने 109 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें 23 सीटों पर सफलता मिली। पहली बार भाजपा और सीपीआई के समर्थन से जनता पार्टी की सरकार बनी। मुख्यमंत्री बने लालू प्रसाद यादव। वर्ष 1995 में सीपीआई ने 61 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। जीत मिली 26 सीटों पर और कुल वोट मिले 4.76 प्रतिशत। इसी बीच लालू यादव ने सीपीआई को तोड़ दिया। सीपीआई के कई यादव विधायक लालू प्रसाद के साथ चले गए। वर्ष 2000 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने 153 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन मिले मात्र 5 सीट और वोट प्रतिशत भी घटकर हो गया 3.60। वर्ष 2005 के फरवरी के विधानसभा चुनाव में सीपीआई ने मात्र 17 सीटों पर उम्मीदवार उतारे जिसमें मात्र 3 सीटों पर सफलता मिली। इस चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा होने के कारण किसी की भी सरकार नहीं बनी और राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा। इसी वर्ष अक्टूबर में हुए चुनाव में सीपीआई ने लोजपा के साथ समझौता कर चुनाव लड़ा। सीपीआई ने 35 सीटों पर चुनाव लड़ा जिसमें 3 सीटों पर हीं जीत मिली। इसके बाद वर्ष 2010 के विधानसभा चुनाव में सीपीआई के मात्र एक विधायक जीते नाम था अवधेश राय बेगूसराय के बछवाड़ा विधानसभा से। इस चुनाव में सीपीआई ने 56 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे। सीपीआई को 1.69 प्रतिशत वोट मिले। वर्ष 2015 में सीपीआई ने 98 सीटों पर चुनाव लड़ा लेकिन सफलता एक भी सीट पर नहीं मिली। यह चुनाव सीपीआई के लिए उसके इतिहास का सबसे स्याह रहा कि उसने एक भी सीट नहीं जीत सका। 
सीपीआई के लगातार कमजोर होते संगठन और बिहार के चुनाव में हावी जाति व धर्म की राजनीति ने धीरे धीरे सीपीआई को हासिये पर ला खड़ा किया है। इस बार के विधानसभा चुनाव में सीपीआई को अपने युवा नेता व जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर उम्मीदें हैं। सीपीआई नेताओं को लगता है कि जिस तरह से अल्पसंख्यक व दलितों के बीच कन्हैया कुमार की लोकप्रियता पिछले दिनों बढ़ी है उसका लाभ इस चुनाव में पार्टी को मिलेगा। लेकिन सबसे बड़ी मुश्किल इस चुनाव में सीपीआई और कन्हैया के सामने कमजोर संगठन और और जिताऊ उम्मीदवारों की कमी है। वहीं दूसरी ओर भाजपा का गांव स्तर पर मजबूत संगठन, नीतीश कुमार काम और नरेंद्र मोदी का नाम है। दूसरी तरफ विपक्ष में नेतृत्व को लेकर हीं अभी असमंजस की स्थिति बनी है। राजद के नेता जहां तेजस्वी यादव को सीएम फेस के रूप में आगे कर चुनाव लड़ना चाहते हैं। इधर कन्हैया के अल्पसंख्यक व दलितों के बीच बढ़ते प्रभाव को लेकर राजद इस चुनाव में सीपीआई को साथ रखने पर भी विचार कर रही है। पिछले दिनों इसी सिलसिले में कांग्रेस के बिहार प्रभारी शक्तिसिंह गोहिल तेजस्वी का संदेश लेकर सीपीआई के दफ्तर गए थे जहां सीपीआई के राज्य सचिव से एक घण्टा तक चर्चा हुई। अब देखना यह है कि सीपीआई और कन्हैया कुमार राजद के साथ जाने को लेकर क्या फैसला लेते हैं। वहीं सूत्रों की मानें तो सीपीआई ने इसबार लगभग 70 से अधिक वैसी सीटों पर लड़ने का प्लान किया है जहां अल्पसंख्यक और दलित वोटर ज्यादा हैं या पहले वो सीट पर पार्टी के उम्मीदवार जीते हैं या करीबी लड़ाई में रहे हों।
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