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चुनाव आयोग की जिम्मेदारी तथा आंकड़ों पर नजर
Team The YuvaTime
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07 August 2020

एनआरआई को मतदाता नॉमिनेट करने का विकल्प! प्रवासियों को क्यों नहीं ?

उम्मीद है भारतीय लोकतंत्र के सबसे शक्तिशाली व मजबूत पक्ष भारतीय नागरिकों को यह मालूम होगा कि भारतीय अर्थव्यवस्था के सबसे अहम किरदार प्रवासी मजदूर जो हर बार मत देने से वंचित रह जाता है। लेकिन वही अगर एनआरआई की बात की जाए तो उनके लिए आयोग उनके अनुसार मतदाता नॉमिनेट करने की सुविधा दे रखा है। यहां सीधे तौर पर फर्क महसूस किया जा सकता है। एनआरआई का मतलब नॉन रेजिडेंट इंडियन, शुद्ध हिंदी में इसका अर्थ अनिवासी भारतीय होता है जो अपने राज्य के किसी व्यक्ति को अपना वोट देने के लिए नॉमिनेट कर सकते है, इस प्रक्रिया को प्रॉक्सी या छप्र वोटिंग कहा जाता है। जबकि प्रवासी वे कहलाते है जो अपने ही देश के किसी एक राज्य से दूसरे राज्य में जीविकोपार्जन अथवा किसी अन्य उद्देश्य से रहते है, जिन्हें ऐसी कोई सुविधा प्राप्त नहीं है।

राजनीति में प्रवासियों को नजरअंदाज
चुनाव की बात हो और मतदाताओं की बात न हो, ऐसा सम्भव नहीं। बात चाहे चुनाव आयोग की तरफ से हो या राजनैतिक पार्टियों की तरफ से। लेकिन कोई प्रवासी मतदाताओं की अधिकारों की बात नहीं करता। क्योंकि राजनैतिक पार्टियों को पता है कि उनके रहने या न रहने से वोट बैंक में कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। देश के अंदर होते हुए भी वे अपना नेता नहीं चुन सकते। ऐसी समस्या से करोड़ों लोग अपने मताधिकार से वंचित रह जाते है। इस समस्या का चुनाव आयोग गंभीर से अवलोकन कर इसका समाधान निकाले ताकि करोड़ों वोट राजनीति के केंद्र से नजरअंदाज न हो सकें।
हालिया दिनों में चुनाव आयोग के कदम
कोविड-19 ने चुनाव आयोग को सोचने पर मजबूर तो जरूर किया है कि जो लोग वोट देने से वंचित हो रहे है उन्हें ऐसी क्या सुविधा दी जाए जिससे वे अपने मताधिकार का प्रयोग कर सकें। हालिया दिनों में चुनाव आयोग ने 65 वर्ष से अधिक उम्र के वरिष्ठ नागरिकों के लिए पोस्टल बैलट से मतदान करना संभव बनाया है। चुनाव आयोग ने ऐसा कदम इसलिए उठाया है क्योंकि बुजुर्ग व्यक्ति इस महामारी के प्रति अधिक जोखिम में हैं। इससे पहले यह विकल्प केवल असक्षम नागरिकों और 80 वर्ष से अधिक उम्र के लोगों के लिए उपलब्ध था। 

प्रवासी श्रमिकों के लिए जरूरी क्यों है प्रॉक्सी वोटिंग
कुछ जानकारों का मानना है कि यही समान सशक्तिकरण दृष्टिकोण प्रवासी श्रमिकों व अन्य वर्गों के लिए भी अपनाया जाना चाहिए जो वोट देने के लिए अपने राज्यों की ओर लौटते हैं। प्रवासी श्रमिक आजीविका की तलाश में एक शहर से दूसरे शहर जाते रहते हैं। चुनाव के समय वे जब वोट नहीं दे पाते हैं तो उन्हें राजनीतिक रूप से शक्तिहीन माना जाता है। 2017 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार भारत में प्रवासी श्रमिकों की संख्या लगभग 13.9 करोड़ है जो भारत की श्रम शक्ति का लगभग एक तिहाई है। प्रवासी श्रमिक आर्थिक आजीविका की तलाश में निर्माण क्षेत्र , घरेलू क्षेत्र, ईंट भट्टों, खानों, परिवहन, सुरक्षा, व कृषि कार्यों, आदि में इधर से उधर यात्रा करते हैं। कई लोग कभी अपने घर और कस्बों में लौटते भी नहीं हैं।
कुछ राज्य सरकारों द्वारा प्रवासियों के प्रति उदासीन रवैये से यह निष्कर्ष निकलता है कि यह समूह राजनीतिक दलों के वोट बैंक का हिस्सा नहीं है। आंतरिक प्रवासी श्रमिक अपने रोजगार के स्थान पर मतदाताओं के रूप में नामांकित नहीं होते हैं क्योंकि इसके लिए उन्हे वहाँ का निवास प्रमाण पत्र देना होगा , साथ ही निर्वाचन आयोग के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं है कि वे प्रवासियों को उनके रोजगार क्षेत्र से वोट देने की सुविधा दे पाये। फिर भी चुनाव आयोग अपने कर्तव्य को देखते हुए ऐसे करोड़ों प्रवासी श्रमिकों के लिए वोट देने का प्रावधान सुनिश्चित करनी चाहिए।
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी तथा आंकड़ों पर नजर
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि प्रत्येक भारतीय जो मतदान करने के योग्य है वे वोटरलिस्ट में पंजीकृत हो। गौरतलब है कि वर्तमान में भारत में 91.05 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता हैं और 2019 के आम चुनाव में रिकॉर्ड 67.4%, यानी 61.36 करोड़ मतदाताओं ने अपना वोट डाला। चुनाव आयोग को एक तिहाई करीब 29.68 करोड़ लोग जो अपना वोट नहीं डालते हैं, उनपर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रयास करना होगा। राष्ट्रीय चुनाव अध्ययन सर्वेक्षणों से पता चलता है कि लगभग 10 करोड़ पंजीकृत मतदाता राजनीति में रुचि की कमी के कारण मतदान करने से बचते हैं। इसके अलावा 20 करोड़ मतदाता ऐसे हैं जो मतदान करना चाहते हैं लेकिन ऐसा करने में वे असमर्थ हैं। इनमें से लगभग तीन करोड़ अनिवासी भारतीय (एनआरआई)हैं। जिन्हें यह अधिकार मिल चुका है कि वह अपने मताधिकार को पूरा करने के लिए किसी और को नॉमिनेट कर सकते है। यह दिलचस्प है कि अनिवासी भारतीयों को अपने मताधिकार का प्रयोग करने में सक्षम करने के लिए सरकार ने कानून बना रखा है। ठीक इसके विपरीत देखा जाये तो यह सुविधा गरीब प्रवासी श्रमिकों के लिए किसी भी प्रकार से उपलब्ध नहीं है।
चुनाव आयोग के लिए आगे की राह
जिस तरह अपने गृह राज्य से दूर तैनात सरकारी कर्मचारी जैसे, सैन्यकर्मी इलेक्ट्रॉनिक रूप से प्रेषित पोस्टल बैलट सिस्टम (ईटीपीबीएस) के माध्यम से मतदान करते है। ठीक उसी तर्ज पर प्रवासी श्रमिकों द्वारा मतदान की सुविधा के लिए चुनाव आयोग को जिला कलेक्ट्रेट के नेटवर्क का उपयोग करते हुए पर्याप्त उपाय करने की आवश्यकता है। चुनाव आयोग का कहना है कि प्रवासियों को अपने मौजूदा मतदाता पहचान पत्र और उनके अस्थायी प्रवास की अवधि के आधार पर अपने शहर के कार्यक्षेत्र में शारीरिक रूप से मतदान करने में सक्षम होना चाहिए। एक ऐसे युग में जहां बैंकिंग लेन-देन ऑनलाइन हो गए हैं। ऐसे में आयोग को एक सलाह देना उचित होता है कि चुनाव प्रक्रिया की विश्वसनीयता से समझौता किए बगैर अपने संबंधित निर्वाचन क्षेत्रों में वोट डालने के लिए तकनीकी रूप से मदद मुहैया कराए जाने की जरूरत है। हालांकि चुनाव आयोग ने कहा है कि वह देश में कहीं से भी अपने मतदाताओं को डिजिटल रूप से मतदान करने में सक्षम बनाने के लिए आधार-लिंक्ड मतदाता-आईडी आधारित समाधान का परीक्षण कर रहा है, जिसमें कुछ और समय लग सकता है।

यह आर्टिकल अमित कुमार द्वारा लिखी गई है। वे यूपीएससी की तैयारी करते हैं। ये उनके निजी विचार हैं।
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