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Rahul Gupta
Rahul Gupta

12 October 2020

मोरवा विधानसभा क्षेत्र: पुष्पम प्रिया चौधरी ने दिया सकारात्मक विकल्प; गणित नहीं, संवेदनाओं का होगा असर

श्वेतांक, शाहपुर पटोरी (समस्तीपुर). मोरवा विधानसभा क्षेत्र बिहार के समस्तीपुर जिले के अंतर्गत आता है।अधिकांश आबादी गांवों में निवास करती है। लोग राजनैतिक रुप से जागरुक हैं और राज्य तथा देश की राजनीति में हो रहे,बनते-बिगरते राजनीतिक दशा की खुब खबर रखते हैं। इन मतदाताओं के पास तो तथ्यों की पर्याप्त जानकारी है परंतु अनुपलब्ध विकल्पों, और संवादहीनता के कारण इस विधानसभा क्षेत्र को ऐसा प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया है जो समुचित रुप में इस क्षेत्र की माँग सदन में उठाये ,जिसके बोलने-सोचने पर राज्य की नजर हो,जिसका नेतृत्व आने वाली पीढियों पर एक साकारत्मक प्रभाव दाल सके।


पिछ्ले दिनों बिहार में अखबारों के पहले पन्ने से खुद को बिहार के मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने वाली पुष्पम प्रिया चौधरी ने सूबे के लोगों को राजनीति को जाति-धर्म से ऊपर उठ कर देखने की संभावना और उसके परिणामों को लेकर एक सकारात्मक विकल्प दिया है। ‘भोज-भात-बियाह’ में जाति-धर्म के आधार पर सोचना व्यक्ति का निजी निर्णय होता है जो सीधे तौर पर राज्य या देश के राजनैतिक-आर्थिक हालातों को प्रभावित नहीं करती है। लेकिन, लोकतंत्र में प्रतिनिधियों के चयन का आधार जाति-धर्म का होना उन प्रतिनिधियों के लिये राजनीतिक अवसरवादिता एक ऐसी भूमिका तैयार करता है जिसके आगे हर बार बस एक ही कहानी लिखी जाती है ‘बाटो और राज करो।’

पुष्पम प्रिया चौधरी और उनकी पार्टी ने इस भूमिका को एक छोटी सी समय अवधि में साकारात्मक रुप में प्रभावित किया है। मध्यम वर्गीय-गरीब तबके से आने वाले शिक्षित लोगों को टिकट देकर कम से कम उनका पहला कदम सिद्धांतों की ही जमीन पर पड़ा है। राज्य की बदली हुई राजनीतिक दशा ने 'मोरवा विधानसभा क्षेत्र' को एक साकारत्मक विकल्प दिया हैं। क्षेत्र में बीते 15 वर्षों से शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार को प्रोत्साहित करने वाले, समाजिक-सांस्कृतिक कार्यों में प्रयोगधर्मिता का उत्कृष्ट नमूना पेश करते रहने वाले उमाशंकर ठाकुर को उम्मीदवार बना कर।

क्षेत्र में लोग उन्हें उमा सर के ही नाम से जानते हैं, चौक-चौराहों पर चर्चा आम है कि गरीब है पर मेहनाती है ईमानदार है। चुनाव प्रचार के लिये किश्त पर ली गयी एक मोटर साइकिल और जोश से भरे छात्रों का समूह, बस इतना ही संसाधन है। परंतु गुजरते वक्त के साथ क्षेत्र में लोगों के बीच बढती स्वीकार्यता ने राजनैतिक पंडितों को नये सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है। संभव है कि इस बार गणित नहीं, संवेदनाओं का असर गहरा हो।
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